अपना सिस्टम

बड़े दिन से देखते आरहे है आरक्षण के बवाल को। कभी इसके विरोध में तो कभी इसके पक्ष मे। न जाने कितनी दोस्ती और प्रेम कहानी इस ज़ात-पात, ऊँच-नीच और 5 के चलते तबाह हो गई! कई रिश्ते जो एक दूसरे के बिना पूरे ही नही हो सकते थे इस "इंटरकास्ट" वर्ड ने खा लिए। न जाने कितने लड़के जिन्हें iit और iim में होना था वे या तो पंखे पे लटक गए या गंगा नदी में समा गए।  खैर हमको क्या? हमारे पास तो सबसे अच्छा जवाब है.. "अमाँ कुछ भी कर लो, ये सिस्टम नही सुधरने वाला"

सबकी अपनी दलीलें हैं और सबके अपने तर्क। कोई अपनी राजनीति चमकाने के लिए "आरक्षण" बाँट रहा है तो कोई अपनी वापसी के लिए "आरक्षण" वापसी की कवायत कर रहा है। भईया दुःख होता है, तकलीफ होती है.. कोई लड़का SSC में 409 नम्बर लाता है और उसे लोअर पोस्ट भी नसीब नही होती और कोई आरक्षणधारी 50 नम्बर कम लाकर भी अधिकारी बन जाता है। कोई छात्र 104 नम्बर पाकर किसी iit के गेट से वापस आजाता है तो कोई आरक्षणधारी 25 नम्बर में भी अंदर जाके क्या जाने कौन रिसर्च कर रहा है?

कुछ लोगो की दलीलें हैं के "हमे वर्षो तक मंदिर में घुसने नही दिया!" और आज देखिये साहब आप "संसद" तक घुस गए हैं। आप "चारा" खा रहें हैं। आप कहते हैं के "लड़को से गलतियां हो जाती है" आप पुलिस से अपनी "भैंस" खोजवा रहे हैं जबकि आधे से ज्यादा अधिकारी और कर्मचारी आप ही कास्ट के हैं। आप कहाँ जात-पात करते हैं? आप तो राजनीति करते हैं। एक मैडम भी तो थी। हाँ वहीँ जिन्होंने 2014 चुनाव में अंडा दिया था। आप एक तरफ लोगों को उनकी जाति बिरादरी का सर्टिफिकेट बाटते हैं और अगर कोई आपको आपकी जात से बुला दे तो आग लग जाती है। आग तक तो ठीक है "हरिजन act"लग जाता है। 

आरक्षण तो सिर्फ 10 वर्षों के लिए था न.. पर आज परमानेंट है। आप शराब बैन कर सकते हैं पर आरक्षण नही। आप खुली सिगरेट रोक सकते हैं पर आरक्षण नही। आप नए अस्पताल खोलवा सकते हैं पर आत्महत्याएं नही रोक सकते। हमारे देश में 90% लोग गलत प्रोफेसन में है साहब। और जो इन 90% का 80% तो सिर्फ आपके आरक्षण के कारण। एक आरक्षण लिया हुआ कंडिडेट उस जनरल कंडिडेट को ऑर्डर देता है जिसने उससे उसी परीक्षा में 80-90 नम्बर अधिक पाये। क्यों?  सिर्फ इसलिए क्योंकि हमारे दादा के दादा ने आपको मन्दिर नही जाने नही दिया। साथ बैठने नही दिया। पता है इस सब में बीच में कौन पिस रहा है? सिर्फ और सिर्फ प्रतिभाशील छात्र. वो जिनके सपने 12वीं के बाद किसी आरक्षण की बलि चढ़ गए। कितने ग्रेजुएट सिर्फ इसलिये PCS नही बन पाये क्योंकि उनका सरनेम यूपी वाले  नेताजी(नेताजी विशेषण सुन के बोस जी की आत्मा को कितनी तकलीफ होती होगी) के सरनेम से मैच नही खाता। 

जो प्रतिभाशील आरक्षित छात्र है उनको भी उतनी इज्जत नही मिलती सिर्फ आरक्षण के कारण। जो बैठे हैं सचिवालय में बड़ी बड़ी कुर्सियों पे उनको आरक्षण की जरूरत है? या किसी गांव के गरीब किसान को जो अपने लड़के को अपनी जमीन बेच के भी शहर पढ़ने को नही भेज पा रहा है?

खैर जाइये साहब पटरियां उखड़िये, शहर जलाइए, लूट-पाट कीजिये, पर्चा आउट कराइये। काश ऐसे वेल्ले कंडिडेट जो डिसर्विंग तो नही थे पर आज आरक्षण के कारण गलत कुर्सी पर बैठे हैं वो "व्यापम" में होते। काश इस जात सर्टिफिकेट के आधार की जगह आप आर्थिक स्थिति के बिहाल्फ़ पे आरक्षण देते.. काश इस आरक्षण को भी कुछ आरक्षण वालों ने ही बनाया होता। काश आप किसी प्रतिभाशाली छात्र को आत्महत्या या मानसिक अवसाद से बचा पाते। काश आप समझ पाते के जब कोई लड़का बोलता है न के "भाई 1 नम्बर से रुक गया सिलेक्शन" तो कैसी हिम्मत चाहिए होती है। काश आप समझ पाते के किसी जनरल लड़के पे क्या गुज़रती है जब वो टाइपिंग में 6.5% गलती कर देता और और उसे मालूम पड़ता है के जनरल की सीमा तो बस 5% गलती की है जबकि अन्य के लिए ये 7%। 

उठिए और खत्म कर दीजिये ये cast सिस्टम, शायद जब कास्ट नही होगी तो आरक्षण के लिए सर्टिफिकेट भी नही बन पायेगा। लेकिन आपको सिर्फ वोट चाहिए. आपको करना है बलात्कार और 5 साल गुंडई। आपको राजनीती करनी है बाकि दुनिया जाये घुइयाँ के खेत में l

 अफ़सोस तो बस इस बात का है के बाबा साहब अम्बेडकर को आज की युवा पीढ़ी के बीच संविधान बनाने के लिए कम और आरक्षण बनाने के लिए ज्यादा याद करती है।

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